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Showing posts from October, 2022

दोहा सृजन

                 कोहिनूर की आभा =========================== छंदमाल्य का मंच यह,पावन छंद विधान। हम सब साधक के लिए, अनुपम है वरदान।। गुरुवर का कर वंदना,पाओ शुभ आशीष। प्रेम भक्ति श्रद्धा सहित,नित्य झुकाओ शीश।। जिनगी है परिकल्पना, उनको करूँ प्रणाम। छंदमाल्य के मंच का, सफल रहे हर काम।। सनातनी विज्ञान का,हम सब करें प्रसार। भारत में साहित्य का,छंद बने आधार।। भावों की परिकल्पना, पावन परम विधान। छंदमाल्य से प्राप्त हो,छंद सृजन का ज्ञान।। ★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

दोहा सृजन

              कोहिनूर की आभा ======================== जगदम्बे  मातेश्वरी , देती  है  शुभ  ज्ञान। भक्तों की रक्षा करें,बनकर कृपा निधान।। कोहिनूर मन से करो,द्वेष कपट का त्याग। तब जागे मनभाव में,भक्ति का अनुराग।। परम पुण्य नवरात्रि में,कर लो माँ का ध्यान। सुख वैभव शुभ श्रेष्ठता,और मिले शुचि ज्ञान।। पुण्य करो मनभाव को,और निखारो गात्र। धन्य बनाओ जन्म को ,आया है नवरात्र।।      ★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

दोहा सृजन

           कोहिनूर के दोहे ========================                  *छंदशास्त्र* छंदशास्त्र के ज्ञान से, मिलता है सम्मान। गढ़ता है साहित्य जो,बनता वही महान।।                   *प्रतिभागी* बढ़ने की जब चाह हो,नित्य करो शुभ कर्म। समझो प्रतिभागी सभी,मानवता का मर्म।।                  *आयोजन* आयोजन जब ठान लो,करना नित संघर्ष। कठिनाई हर दूर हो, तभी मिले मन हर्ष।। ★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

ईश्क़

         मुक्तक - ईश्क़ ====================== तेरे बिन चैन भी मिलता नही है जीने में, मजा आता है तेरे होठ के रस पीने में। संभालना बड़ी मुश्किल है तेरी यादों को, लगी है आग तेरे प्यार की इस सीने में। तेरे ही नाम में जीवन भी कर जाऊँगा, समझ नहीं की मैं संसार से डर जाऊँगा। तेरे ही नाम का मन मेरा दीवाना है, मुझे मत छोड़ना नहीं तो मैं मर जाऊँगा। तेरे नैनों की शोखियाँ मुझे गुलजार करें, सदा इकरार ही आये नही इनकार करें। बहुत मिली दीवानीयाँ मुझे जमाने में, मेरा मन चाहता है तू ही मुझे प्यार करें। ★★★★★★★★★★★★★★★  डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

दोहा सृजन

 *दोहा सृजन हेतु शब्द* ======================= *संसार* शुचिता के संसार में,निष्ठा का उजियार। अमर रहे संकल्पना , प्रेम बने आधार।। *समर्पण* जहाँ समर्पण है नहीं,वह जीवन है व्यर्थ। इसलिए संसार में , सभी  चाहते  अर्थ।। *सौभाग्य* मानवता की राह में,फलता है सौभाग्य। पर ऐसे भी हैं कई,जिनका है दुर्भाग्य।। ★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

दोहा सृजन

     *दोहा सृजन हेतु शब्द* ========================== धरती फुलझड़ियों के रौशनी,करता दीप प्रकाश। धनतेरस से है  सुरभ,यह  धरती  आकाश।। अंबर अंबर नीला देखकर,करते जब प्रवास। मुश्किल कितनी भी रहे,बनते वह है खास।। नीर बिन पानी सब जीव तो,होते हैं मजबूर। प्यासे में जो ढूढ़ते,कोई पिला दो नीर।। पावक पावक बिन संसार में,नही बने कुछ काम। अंत समय जब आये तो,जाना है सुखधाम।। पवन मंद पवन पुरवईया, शीतलता हर ओर। मस्त मगन कर नाचे,मृगनयनी मन मोर।। ★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

दोहा सृजन

 *दोहा सृजन हेतु शब्द* *1 - विधिवत* विधिवत सब होता रहे,शासन का हर काम। जनता के दरबार में, सदा रहे सुखधाम।। *2 - वितान* जीवन की इस दौड़ में, सिर पर रहे वितान। शिखर सदा सर्वोच्च हो, बढ़े जगत सम्मान।। *3 - विध्वंस* प्रेम-भाव सद्भावना, पावन रहे विचार। नहीं कभी विध्वंस हो, सुखी रहे संसार।। ★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

भारत की माटी

 माहिया छंद -भारत की माटी ★★★★★★★★★★★ पूजा की आरत हैं, समता है जिसमें.... यह मेरा भारत है हो स्वर्ग हिमालय सा, हृदय रहे अपना... कैलाश शिवालय सा पावन परिपाटी हैं चंदन के  जैसा  भारत की माटी है प्यासे समशिरो को चाह चलाने की भारत के वीरों को रक्षक जो सीमा के वह भी बेटे है अपनी भारत माँ के वह कर्म महान किया भारत के पग में अपना बलिदान किया मैं शीश झुकाता हूँ गाथा वीरों की श्रद्धा से गाता हूँ ★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे"कोहिनूर"

बाबा घासीदास

 विधाता छंद - बाबा गुरुघासीदास =========================== अगर संसार के जन में,कभी सन्त्रास बढ़ता है। कलुषता छद्म छल विपदा,जहाँ पर त्रास बढ़ता है। सजे जब सत्य अंतस में,तभी विश्वास बढ़ता है। मिटाने हर कलुषता को,तभी यह दास बढ़ता है। नैन निज खोलकर अपनी,ज्ञान का सार गहना है। सभी को संग लेना है, सभी को संग रहना है। प्रेम रसधार में हमको,द्वेषता त्याग बहना है। सभी मानव बराबर है,यह घासी का कहना है। किसी से भेद मत करना,सदा सम्मान ही करना। बढ़े पिछड़े सभी आगे,यही अवदान नित करना। जगत उत्थान करने को,सभी का पीर है हरना। हृदय में हर मनुजता का,परम् विश्वास है भरना। लोभ छल दंभ द्वेषों का,जहाँ संसार होता है। वहीं मानव भटकता है,जहाँ पर हार होता है। सत्य के राह में चलना,जनम का सार होता है। जहाँ घासी कृपा करते,जनम उद्धार होता है  ★★★★★★★★★★★★★★★★★  डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️✍️

छंदमाल्य

                 कोहिनूर की आभा =========================== छंदमाल्य का मंच यह,पावन छंद विधान। हम सब साधक के लिए, अनुपम है वरदान।। गुरुवर का कर वंदना,पाओ शुभ आशीष। प्रेम भक्ति श्रद्धा सहित,नित्य झुकाओ शीश।। जिनगी है परिकल्पना, उनको करूँ प्रणाम। छंदमाल्य के मंच का, सफल रहे हर काम।। सनातनी विज्ञान का,हम सब करें प्रसार। भारत में साहित्य का,छंद बने आधार।। भावों की परिकल्पना, पावन परम विधान। छंदमाल्य से प्राप्त हो,छंद सृजन का ज्ञान।। ★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

आध्यात्मिक चिंतन

   गुरु घासीदास: आध्यात्मिक चिंतन   ======================== अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ - अंतर्मन हो जाना अर्थात अपनी आत्मा की आवाज है।जीवन में अध्यात्म का बड़ा ही महत्व है।अध्यात्म योग दोनों एक दूसरे के पूरक है। योग साधनाओं में यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान,समाधि,बंध एवं मुद्रा सत्कर्म युक्त आहार मंत्र जप युक्त कर्म आदि साधनाओं से हम अध्यात्म के परम्आंनद की प्राप्ति कर सकते हैं।     आज मानव सांसारिक सुख सुविधाओं से लिप्त है। सांसारिक सुख एक बाह्य सुख है।मानव अपने पूरे जीवन को सांसारिक सुख में ही बिताकर नष्ट कर देते है।अंत समय में आध्यात्मिक सुख की खोज में देवालय मंदिर,गिरजाघर, मस्जिद आदि में जा जाकर जीवन में शांति ढूंढने के लिए भटकते फिरते रहते हैं और अंत में अपनी देह त्याग देते हैं। वास्तविक में असली शांति तो शरीर के अंतर्मन अंतरात्मा में ही बसा रहता है।यदि मानव बाहर ना ढूंढकर अपने अंदर ही यदि ढूंढे तो अध्यात्म का परम सुख शांति को प्राप्त कर सकते है।और इसके लिए अंतर्मन होना पड़ेगा तब उसको परम आनंद कीअनुभूति प्राप्त हो सकता है।यदि जीवन में परम सुख...

बेटियाँ

               बेटियाँ ================== वसुंधरा में रीति नीति ,             परिपाटी हैं ये बेटियाँ। नभ तक जाने को हर बेड़ी,                  काटी हैं ये बेटियाँ। मुख में मधुर-मधुर मुश्काने,                मन मंदिर में ममताई। कोमल उर्वर समर्पिता सम,                     माटी है ये बेटियाँ।। ★★★★★★★★★★★★★      ★डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

मुक्तक प्रेम

       मुक्तक -- मोहब्बतें ============================= तेरा हँसना व मुस्काना, मुझे मदहोश करता है। नही तुझसे बिछड़ जाऊँ,दीवाना दिल ये डरता है। बडी मासूम भोली हो,हो रोशन चान्दनी जैसा। दीवाना है सनम तेरा,तुम्हीं से प्यार करता है। तेरा ही नाम को हरपल,सनम मैं याद करता हूँ। तेरे कारण स्वयं से मैं ,सदा सवांद करता हूँ। बिछड़ जाने से डरता हूँ,तेरे बिन जी नही सकता। तभी रब से तेरे ही बाद,मैं फरियाद करता हूँ। तेरी यादें तेरी बातें, मुझे हरपल सताती हैं। तुझे जब देख लेता हूँ,निगाहें चैन पाती हैं। मगर तुमने नहीं समझा,मेरे मन भाव को शायद। तेरा गैरों के संग चलना,मेरे दिल को जलाती हैं। तू चंदा तो मैं सूरज बन,समां रौशन बनाएंगे। किसी दिन ईद दीवाली,कभी होली बनाएंगे। निगाहों के इशारे से ,करेंगे बात हम दोनों। गले मे डालकर बाँहे, खुशी के गीत गाएंगे। तेरी चंचल निगाहों में,अदा में नूर आया है। तुझे मिलने को दीवाना,सनम बड़ी दूर आया है। जला लेना चरागों को,समां रौशन बना रखना। तुझे मिलने तेरे घर में, ये कोहिनूर आया है। ★★★★★★★★★★★★★★★★   डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️✍️

दलितजनों जागों

         दलितजनों जागो अपना उत्थान करो =============================== एकलव्य बन निज बाणों में,ब्रम्ह अस्त्र संधान करो। दलितों जागो नैन खोलकर,अब अपना उत्थान करो।। कब तक अत्याचार सहोगे, कब तक अश्रु बहाओगे। निर्दोषी होकर कब तक ही,अपनी प्राण गँवाओगे। क्या गलती थी उस बालक की,जिसको शिक्षक ने मारा। ऐसे जितने आज अधर्मी,मानवता उनसे हारा। निज हक पाने को आंदोलन,अब तो प्रखर महान करो। दलितों जागो नैन खोलकर,अब अपना उत्थान करो।। जाति धर्म का भेद भूलकर,हमको गले लगाते है। जब चुनाव बेला आती तो,दलितों के घर खाते है। एक तरफ चोला ओढ़े ये,मानवता का रक्षक बन। उन दुष्टों को यही बचाते,जो शापित है भक्षक बन। दुष्ट नपुंसक नेताओं का,नहीं कभी सम्मान करो। दलितों जागो नैन खोलकर,अब अपना उत्थान करो।। ★★★★★★★★★★★★★★★★★      ~~ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️✍️

कलम यह बोल रहा है

        कलम यह बोल रहा है ======================== अपना भारत वर्ष सजग है,मानवता के राहों में। धरम करम लेकर चलता है,नित ही अपने बाहों में। इसके ओरो से छोरो तक,पावन शुभ हरियाली है। बाग बगीचे झूम रहे हैं, आनंदित हर डाली है। इस बगिया में जाने कैसे,घास फूंस उग आते है। सदियों से जो दलितजनों पर,अपना हुकुम चलाते है। कर्म इन्ही के खुशियों में,विष घोल रहा है। मनुजता डोल रहा है, कलम यह बोल रहा है। रंग भेद के कारण अब भी,नफरत है परिपाटी में। धर्म बड़ा है छोटा कब है,एक धरा की माटी में। मानव ही मानव से मिलकर,मानवता छल जाता है। मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में,अब भी बंदूक चल जाता है। आज सृजन यह सबकी आँखे, खोल रहा है। मनुजता डोल रहा है, कलम यह बोल रहा है। ★★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"✍️✍️

विडंबना

      दलित छात्र इंद्र की हत्या (विडंबना) ========================= हाय विधाता जाने कैसी ये,अब विडंबना आई है। छोटे छोटे बच्चों पर भी,आज मुसीबत छाई है।। शिक्षा के मंदिर में भारी,अब भी तो हैवानी है। इस भारत में मानवता की,कितनी बुरी कहानी है।। इंद्र मेघवाल की घटना ने,मानवता शर्मसार किया। जातिवाद व छुआछूत से,छैलसिंग ने वार किया।। ऊँच नीच व भेदभाव का,कब तक चलेगा खेल। ऐसी निर्दयी को हो फाँसी, होना नही अब जेल।। आरक्षण के विरोधी सुन लो,आरक्षण सभी हटवा दो। मानव धर्म  एक बनाकर,जातिवाद जड़ से मिटवा दो।। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️✍️

आजादी का अमृत महोत्सव

          आजादी का अमृत महोत्सव ============================ आजादी का अमृत महोत्सव,भारत भू महकाएगा। सबके घर में आज तिरंगा,लहर-लहर लहराएगा। शौर्य दिखाया खूब रणों में,बरछी भाला तीरों ने। प्राणों की बलिदानी देकर,आजादी दी वीरों ने। भारत भू में हर बालक को,स्वभिमान ही प्यारा है। इसलिए प्राणों से प्यारा, पुण्य त्रिरँग हमारा है। शांति त्याग का,हरियाली का,सबमें भाव जगाएगा। सबके घर में आज तिरंगा,लहर-लहर लहराएगा। मुकुट हिमालय की चोटी है,सागर पाँव पखारा है। गुरुताई में इस भारत से,पूर्ण जगत ही हारा है। धर्म सनातन अमर हमारा,पावन हर परिपाटी है। जिसको हम जननी कहते है,चंदन जैसी माटी है। सीमा पर जो वीर खड़ा वह,अरिदल मार भगाएगा। सबके घर में आज तिरंगा,लहर-लहर लहराएगा। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★      डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️✍️

कामनवेल्थ गेम

 घनाक्षरी - कामनवेल्थ गेम ★★★★★★★★★★ बजरंग फाड़ रहे , सबको पछाड़ रहे। सिंह की हुँकार और, बाजुओं में जान है।  खेल में निभा के रीत,  दीपक ने पाई जीत। स्वर्ण का पदक पाके, बना हुआ शान है । साक्षी ने जो काम किया, बेटियों ने नाम किया। स्वर्ण देके भारत को, निभाई विधान है। खिलाड़ी का बढ़ा बल, नहीं है कपट छल। मोदी जी के आने से जो, भारत महान है। ★★★★★★★★★★ अब दिन रात हुई, स्वर्ण बरसात हुई। कुश्ती भारत्तोलन में, जीत रहे जग को। मार रहे मुक्केबाज, धावक के सिर ताज। अतुलित बल रखे, वीर रग रग में। लंबीकूद टेनिस में, जूडो में भी जीत रहे। स्वर्ण है बरस रहा, भारत के पग में। सिंह सा दहाड़ पाए, हमे जो पछाड़ पाए। कहाँ वह बल बचा, प्रतिद्वंद्वी ठग में। ★★★★★★★ खुशियाँ बरस रही, भारती हरष रही। छलिया तरस रही, शुभ दिन आई है। प्रीति की निभा के रीत, जग में दिला के जीत। खिलाड़ियों ने खेलो में, स्वर्ण बरसाई है। जहाँ हो हमारे शेर, दुनिया वही हो ढेर। पग-पग भारती का, मान ही बढ़ाई है। बुलन्द आवाज हुआ, अपना ही ताज हुआ। स्वर्ण पद पा त्रिरँग, आज लहराई है। ★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे"कोहिनूर"

चाँद का टुकड़ा

          मुक्तक - चाँद का तुकड़ा ============================ तेरी बोली है कोयल सी,छवि है चाँद का तुकडा। तेरी शोखी निगाहें ये,बढ़ाती है मेरा दुखड़ा। ये मेरा मन कभी करता है,आकर पास में तेरे। तुझे बांहों के झूले में,झुलाकर चुम लूँ मुखड़ा। मेरे खातिर मेरी जानम,सदा तुम आह भरती हो। इशारों में जताती हो,मगर कहने से डरती हो। छुपा लो लाख तुम मुझसे,पता चलही तो जाता है। मेरी उम्मीद से बढ़कर,मुझे तुम प्यार करती हो। नहीं लगता जिया मेरा,तेरे बिन आज गांवों में। तेरे बिन बल नहीं बढ़ता,मेरे बेजान बाँहों में। चली आओ तुम्हारे बिन,सँभलना है बहुत मुश्किल। छुपा लेना बना अपना,मुझे जुल्फों की छाँवों में। धड़कती हो मेरे दिल में,मेरी धड़कन बढ़ाती हो। मेरे बस में नहीं जो मय,वहीं मुझ पर चढ़ाती हो। अगर मुझसे नहीं करना है,तुमको प्यार जानेमन। कहो क्यूँ प्यार की बातें, निगाहों से पढ़ाती हो। निगाहों के इशारों से,कभी मुझको लुभाती हो। कभी तुम दूर रहती हो,कभी नजदीक आती हो। दिखाती हो वहीं मुझको,जिसे मैं छू नहीं सकता। बनाकर प्यार में पागल,मुझे हर पल सताती हो। तुम्हारे प्यार बिन जाना,मैं मर जाने से डरता हूँ। ब...

शिव महिमा

              गीत -- शिव महिमा ============================== पुण्य मास सावन में जब जब,सोमवार का भोर हुआ। सभी जगह के शिवालयों में,शिव महिमा का जोर हुआ।                             //1// शिव शंकर जी आभूषित है,दूध नीर के धारों से। मंदिर मंदिर गूंज रहा है, बम बम की जयकारों से। श्रद्धा भक्ति लेकर मन में,भक्त प्रमोदित है सारे। सबके मन मे आश यहीं है,शिव जी हमको भी तारे। शिव दर्शन पाने वाले का,तनमन भाव विभोर हुआ। सभी जगह के शिवालयों में,शिव महिमा का जोर हुआ।                             //2// शिव जी की पूजन करने से,कट जाते है पाप सभी। जिस पर शिव जी कृपा करेंगें,मिट जाते संताप सभी। बिन मांगे सब कुछ देते है,शिव जी अंतर्यामी है। देवों में जो महादेव है , तीन लोक के स्वामी है। इस सावन में शिव भजनों का,हर मंदिर में शोर हुआ। सभी जगह के शिवालयों में,शिव महिमा का जोर हुआ। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★      ✍️✍️ = डिजेन्द्र कुर्...

प्यार की बातें

           मुक्तक - प्यार की बातें ======================== मुझे बेहाल करती है,तेरी रसदार ये बातें। मेरे कोरे हृदय पट को,भिगोती प्यार की रातें। नहीं भूलूँगा मैं जानम,निमंत्रण नेह उस दिन का। प्रणय करने दिया तुमने,जो मुझको पुण्य सौगातें। पिलाया प्यार का मुझको,सुधा रस घोल के तुमने। किया घायल मेरे दिल को,सजन जी बोल के तुमने। मुझे अब भी नहीं विश्वास,हो पाता है उस पल का। निमंत्रण दी प्रणय करने ,हृदय पट खोल के तुमने। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"✍️✍️✍️

हमदम

            मुक्तक - हमदम ============================ कभी तेरी किसी बातों से,कब इनकार है हमको। गिरा दो या उठा दो तुम,सदा इकरार है हमको। नहीं जीना तुम्हारे बिन,हमें संसार मे हमदम। दीवाना हूँ तुम्हारा ही,तुम्हीं से प्यार है हमको। जवानी में मोहब्बत का,मुझे अब रंग भरना हैं। नहीं झुकना कभी मुझको,नहीं दुनिया से डरना हैं। तुम्हारे बिन नहीं मेरा,कोई पहचान इस जग में। तेरे बाहों में जीना है,तेरे बाहों में मरना हैं। तू जितना रूठ ले मुझसे,तुझे इक दिन मना लूँगा। तेरी गैरत को भी हमदम,मैं अपना दिल बना लूँगा। तू गर आवाज दे मुझको,जहाँ को छोड़ कर आऊँ। बसाकर मन की मंदिर में,तुझे मंजिल बना लूँगा। जिसे मैं रोज पूजूँगा,प्रिये तुम ही ओ मूरत हो। तुम्हारे नाम से धड़के,मेरे दिल की जरूरत हो। तुम्हारे बिन न रो पाऊँ,नहीं मैं हँस कभी सकता। वहीं एहसास जीवन की,तुम्हीं तो खूबसूरत हो। जिसे दिल ने सदा चाहा,जिसे पाने को ठाना हूँ। इबादत रोज करने को,खुदा जिसको मैं माना हूँ। पलटकर देख ले मुझको,भी तू एकबार ये जानम। तेरा ही हमनशी हूँ मैं,तेरा ही मैं दीवाना हूँ। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★  डिजेन्द्र कु...