आध्यात्मिक चिंतन

   गुरु घासीदास: आध्यात्मिक चिंतन

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अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ - अंतर्मन हो जाना अर्थात अपनी आत्मा की आवाज है।जीवन में अध्यात्म का बड़ा ही महत्व है।अध्यात्म योग दोनों एक दूसरे के पूरक है। योग साधनाओं में यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान,समाधि,बंध एवं मुद्रा सत्कर्म युक्त आहार मंत्र जप युक्त कर्म आदि साधनाओं से हम अध्यात्म के परम्आंनद की प्राप्ति कर सकते हैं।

    आज मानव सांसारिक सुख सुविधाओं से लिप्त है। सांसारिक सुख एक बाह्य सुख है।मानव अपने पूरे जीवन को सांसारिक सुख में ही बिताकर नष्ट कर देते है।अंत समय में आध्यात्मिक सुख की खोज में देवालय मंदिर,गिरजाघर, मस्जिद आदि में जा जाकर जीवन में शांति ढूंढने के लिए भटकते फिरते रहते हैं और अंत में अपनी देह त्याग देते हैं। वास्तविक में असली शांति तो शरीर के अंतर्मन अंतरात्मा में ही बसा रहता है।यदि मानव बाहर ना ढूंढकर अपने अंदर ही यदि ढूंढे तो अध्यात्म का परम सुख शांति को प्राप्त कर सकते है।और इसके लिए अंतर्मन होना पड़ेगा तब उसको परम आनंद कीअनुभूति प्राप्त हो सकता है।यदि जीवन में परम सुख की प्राप्ति करना चाहते हैं तो अध्यात्म को मानना पड़ेगा।जानना पड़ेगा।और इसे जीवन में अपनाना पड़ेगा।


अध्यात्म अर्थात अपनी अंतरात्मा की आवाज को पहचानना अपने आप को जानना।संसार में चाहे वह किसी भी धर्म संप्रदाय से आता हो।कोई भी मनुष्य जो अपने आप को एकाग्र किया है एवं आंतरिक शक्ति को जान लेता है ।यही आध्यात्मिक शक्ति कहलाती हैं।विश्व के महान संत शिरोमणि गुरु घासीदास एक ऐसे तपस्वी संत थे जिन्होंने बाल्यकाल अवस्था में ही सत्य के प्रति समर्पित था। सत्य व अहिंसा  के पुजारी था। एवं सभी को समभाव रखने वाला  देव पुरुष था।गुरु घासीदास केवल सतनामी समाज को ही संदेश नहीं दिया अपितु पूरे विश्व के सभी मानव सम्प्रदाय को संदेश दिया है। *मानव मानव एक समान* कथन से हमे स्पष्ट होता है कि मानव का केवल एक ही धर्म है।वह है मानव धर्म। मानव धर्म में हमें क्रोध,लालच,ईर्ष्या,चोरी,लूटपाट,व्यभिचार इत्यादि को त्यागकर सत्कर्म करने को सिखाता है।

शिरोमणि गुरु घासीदास जी ने छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी धाम छाता पहाड़ में उन्होंने तपस्या किया।सत्य की खोज के लिए हमेशा मनन चिंतन करते थे।उन्होंने मानव जाति को जगाने के लिए घर घर जाकर नशामुक्ति एवं सादा जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है।मानव जीवन के उत्थान के लिए अपना सर्वस्व जीवन न्यौछावर कर दिया।

सतगुरू घासीदास जी की सात शिक्षाएँ हैं-

(१) सतनाम् पर विश्वास रखना।


(२) जीव हत्या नहीं करना।


(३) मांसाहार नहीं करना।


(४) चोरी, जुआ से दूर रहना।


(५) नशा सेवन नहीं करना।


(६) जाति-पाति के प्रपंच में नहीं पड़ना।


(७) व्यभिचार नहीं करना।


गुरु घासीदास ने अपने आत्मचिंतन और तपस्या के बल पर समाज सुधार के लिए कुछ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया उन्हें हम सप्त सिद्धांत कहते हैं। ये सात सिद्धांत स्वानुभव और जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर आधारित थे। ये सात सिद्धांत हैं :-


1.            सतनाम पर विश्वास


2.            मूर्तिपूजा का निषेध


3.            वर्ण भेद से परे


4.            हिंसा का विरोध


5.            परस्त्री गमन की वर्जना


6.            दोपहर में खेत न जोतना


7.            व्यवसन मुक्ति



गुरु घासीदास ने सतनाम को ही ईश्वर और प्रकृति का रूप माना। उनका कहना था कि ईश्वर सत्य है, निर्गुण और निराकार है। सत्य को आचरण में उतारना चाहिए। सतनाम पर विश्वास करके हम मानव जीवन को सार्थक कर सकते हैं। बाह्य आडंबरों से बच सकते हैं। जब ईश्वर सत्य है और प्रकृति का रूप है, तब मुर्तिपूजा क्यों? मुर्तिपूजा आस्था का आडंबर है। ईश्वर अन्तस्थ है और सबसे परे। ईश्वर प्रकृति है और प्रकृति ही ईश्वर।मंदिरों में मुर्तिपूजा आडंबर है। हम अपने भीतर बैठे आत्मतत्व को जानें  और उसी की आराधना करें, क्योंकि आत्मा रूप ईश्वर चेतन है।


गुरु बाबा घासीदास जी ने सतनाम ध्यान के लिए लोगों को जागृत किया है।और कहा है कि - ध्यान करने के लिए स्वच्छ जगह पर स्वच्छ आसन पे बैठकर साधक अपनी आँखे बंध करके अपने मन को एकाग्र करना।आत्मा, निराकार परब्रह्म या किसी की भी धारणा करके उसमे अपने मन को स्थिर करके उसमें ही लीन हो जाता है। जिसमें ईश्वर या किसी की धारणा की जाती है उसे साकार ध्यान और किसी की भी धारणा का आधार लिए बिना ही कुशल साधक अपने मन को स्थिर करके लीन होता है उसे सतनाम ध्यान कहा जाता है।

ध्यान करने के लिए पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन अथवा सुखासन में बैठा जा सकता है। शांत और चित्त को प्रसन्न करने वाला स्थल ध्यान के लिए अनुकूल है। रात्रि, प्रात:काल या संध्या का समय भी ध्यान के लिए अनुकूल है। ध्यान के साथ मन को एकाग्र करने के लिए प्राणायाम, नामस्मरण (जप), त्राटक का भी सहारा लिया जा सकता है। ध्यान में ह्रदय पर ध्यान केन्द्रित करना, ललाट के बीच अग्र भाग में ध्यान केन्द्रित करना, स्वास-उच्छवास की क्रिया पे ध्यान केन्द्रित करना, इष्टदेव या गुरु की धारणा करके उसमे ध्यान केन्द्रित करना, मन को निर्विचार करना, आत्मा पे ध्यान केन्द्रित करना जैसी कई पद्धतियाँ है।सतनाम ध्यान के साथ प्रार्थना भी कर सकते है। साधक अपने गुरु के मार्गदर्शन और अपनी रुचि के अनुसार कोई भी पद्धति अपनाकर ध्यान कर सकता है।


सतनाम ध्यान के अभ्यास के प्रारंभ में मन की अस्थिरता और एक ही स्थान पर एकांत में लंबे समय तक बैठने की अक्षमता जैसी परेशानीयों का सामना करना पड़ता है। निरंतर अभ्यास के बाद मन को स्थिर किया जा सकता है और एक ही आसन में बैठने के अभ्यास से ये समस्या का समाधान हो जाता है। सदाचार, सद्विचार, यम, नियम का पालन और सात्विक भोजन से भी ध्यान में सरलता प्राप्त होती है।


सतनाम ध्यान का अभ्यास आगे बढ़ने के साथ मन शांत हो जाता है जिसको योग की भाषा में चित्तशुद्धि कहा जाता है। ध्यान में साधक अपने शरीर, वातावरण को भी भूल जाता है और समय का भान भी नहीं रहता। उसके बाद समाधिदशा की प्राप्ति होती है। कई सतनाम ग्रन्थों के अनुसार सत ध्यान से कुंडलिनी शक्ति को जागृत किया जा सकता है और साधक को कई प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त होती है।

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                   डिजेन्द्र कुर्रे (साहित्यकार)


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