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Showing posts from November, 2022

दोहा सृजन

                दोहा सृजन ★★★★★★★★★★★★★★ मानवता के भाव को,पुण्य बनाएं हेम। हिंदी माता की तरह,करती ममता प्रेम।। बिंदी कंगना पैजनी,और गले का हार। कुमकुम रोली सिंदूरी,नारी का श्रृंगार।। कालिंदी के पास में,मित्रों से कर मेल। जग के तारणहार भी,कर रहे है खेल।। ★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

अधिकार

        अधिकार पर दोहे  ======================= मन में दंभ कपट भरा,दिखने में भंगार। जता रहे फिर भी छली,बढ़ चढ़कर अधिकार।। निज-निज अधिकार का,पीट रहे जो ढोल। टिके कहाँ आडम्बरी , खुलते सबके पोल।। हम सबके अधिकार पर, देते जो नित ज्ञान। उनके ही मन मे भरा,कलुष कपट अभिमान।। इतराते अधिकार पा,भूले जो निज कर्म। वे ही भौंकें श्वान सम, बन ठनकर बेशर्म।। कोहिनूर नित चाहता,बनकर रहना हेम। दूर रहे अधिकार से,करके सबसे प्रेम।। ★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

वीर नारायण

            बलिदानी वीर नारायण सिंह ========================== चिन्हारी जे वीर पुरुष हे,भरे कटोरा धान के। वीर नारायण ले पबरित हे, भुइँया सोनाखान के। वीर नारायण के जिनगी म,अइसे दिन भी बीते हे। एक अकेला अंग्रेजी शासन से,लड़ के  जीते हे। जब अकाल के बेरा आईस,जन-जन तरसीन दाना ल। धरम करम बर ये ही धरमी,लुटे रहिस खजाना ल। घोड़ा म चढ़के जाएँ, बलिदानी सीना तान के। वीर नारायण ले पबरित हे, भुइँया सोनाखान के। बज्र बरोबर तन के बलिदानी,जब भुइँया नापे। सेट महाजन अउ अँग्रेजी,शासन थर-थर काँपे। जेहर आघु म आ जाये,अपन प्राण गवाएं। मेंछा म दे ताव वीर जब,जब तलवार चलाये। आज वहीं बलिदानी दे,आदर्श हमर अभिमान के। वीर नारायण ले पबरित हे, भुइँया सोनाखान के। ★★★★★★★★★★★★★★★★★         डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

बलिदानी वीर नारायण

             महिमा वीर नारायण के =============================== महिमा वीर नारायण के ये,जे भुइँया म भारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। जन-जन के हितवा बनके,जे बेटा बिताईन जी। धन के लोभी छलिया मन ल,निसदिन यही सताइन जी। माल खजाना लूट लूट के, निर्धन मन ल दान करे। भांज अपन तलवार ल मेंछा,म साहस के ताव भरे। ममता दया करे जेकर  बर, छत्तीसगढ़ महतारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। नाम अमर हे बलिदानी के,छत्तीसगढ़ परिपाटी म। आज भी जेहर हवय बिराजे,ये भुइँया के माटी म। सोनाखान धरा के धुर्रा,पबरित जइसे चंदन हे। बलिदानी के ये महिमा ल,कोहिनूर के वंदन हे। कल बलिदानी लड़ीस न्याय बर,अब हे हमरो पारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। वीर नारायण लड़ीस न्याय बर,अब हे हमरो पारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★★             डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"✍️✍️

मुक्तक - प्यार

 मंच मुक्तक - प्यार ============== तू जितना रूठ ले मुझसे,तुझे इक दिन मना लूँगा। तेरी गैरत को भी हमदम,मैं अपना दिल बना लूँगा। तू गर आवाज दे मुझको,जहाँ को छोड़ कर आऊँ। बसाकर मन की मंदिर में,तुझे मंजिल बना लूँगा। जिसे मैं रोज पूजूँगा,प्रिये तुम ही ओ मूरत हो। तुम्हारे नाम से धड़के,मेरे दिल की जरूरत हो। तुम्हारे बिन न रो पाऊँ,नहीं मैं हँस कभी सकता। वहीं एहसास जीवन की,तुम्हीं तो खूबसूरत हो। जिसे दिल ने सदा चाहा,जिसे पाने को ठाना हूँ। इबादत रोज करने को,खुदा जिसको मैं माना हूँ। पलटकर देख ले मुझको,भी तू एकबार ये जानम। तेरा ही हमनशी हूँ मैं,तेरा ही मैं दीवाना हूँ। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★  डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"✍️✍️✍️

विवेकानंद

          स्वामी विवेकानंद जी          ============== जिनके मन में शुभताओं के,होते है मकरंद। वही जगत में बन पाते है ,संत विवेकानंद।। नहीं उपजता है जब मन में,लोभ कपट अनुराग। सांसारिक हर सुख का करते जो,उर अंतस से त्याग। धर्म ध्वजा लेकर  चलते है,करने जग उत्थान। उनके शुभ कर्मो से होता,जग में सुखद बिहान। कभी नहीं छू सकता जिनको,कलुष कुटिलता फंद। वही जगत में बन पाते है ,संत विवेकानंद।। सत्य सनातन त्याग आज हम,चून पीड़ा के शूल। उस कर तार जगत पालक को,आज गए है भूल। अपने  पग में कुल्हाड़ी से,करते है नित वार। फिर कैसे न मिले जगत में,मानवता को हार। निष्ठा धैर्य हृदय में धारे,नहीं बने मतिमंद। वही जगत में बन पाते है ,संत विवेकानंद।। ★★★★★★★★★★★★★★★★★       डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

वीर रस - श्री राम

     भारत में श्री राम हुए ================= जिनसे भारत का नाम अमर, जिनसे सुर भी रजधानी है। जिनसे विपदाएँ टलते है,  रवि चंद्र उगे और ढ़लते है। जिसे नाम से धर्म संवरते है, जिनसे बाधाएँ डरते है। जिनकी सत्ता भू व्योम तलब तक, कण कण छण छण सुखधाम हुए। वह ही मर्यादा के साधक, इस भारत में श्री राम हुए। जब पाप बढ़ा इस धरती पर, तब धर्म ध्वजा धारण कर ली। शक्तिशाली रावण का भी, घर में घुस संघारण कर ली। जिनके ध्वज फहराते है सब, निज घर के शीर्ष मुंडेरों में।  वह राम मिलेंगे शबरी के,  जूठे मीठे हर बेरो में।  युग युग से तारण मोक्ष मिला,  जिनके शुभ पुण्य कहानी में।  जिसमें लिख जाता राम नाम,  पाहन भी तैरे पानी में।  वाल्मीकि तुलसी के हृद के,  थे जो ललित ललाम हुए।  वह ही मर्यादा के साधक, इस भारत में श्री राम हुए। जब राज तिलक के बदले में, रघुनंदन को वनवास मिला। जो सबके प्राण हरण करते, उस पालक को भी त्रास मिला। वानर को जिसने मित्र चुना, उनको हनुमत सा दास मिला। जिनसे त्रेता में जन्म लिया, साधु संतों के ढाल बने। उद्धार अहिल्या का कर के, उद्धारक परम ...

ज्ञान सुधा 2

           भाग - 2 ज्ञान सुधा (बाल पत्रिका) ================= ज्ञान सुधा का अमृत पी लो, विद्यार्थी का जीवन जी लो। ज्ञान बिना जीवन दुखदाई, बात समझ लो बहना भाई। कदम से कदम मिला चलना है, कुंदन के जैसे जलना है। लहराए यह पुण्य तिरंगा, बहे ज्ञान की पावन गंगा। राम कृष्ण मुनियों की धरती, सबका  पालन पोषण करती। अन्न धन की भंडार यही है, ममता प्यार दुलार यही है। धरती अम्बर तक जो फैला, खुशियों को मत करना मैला। शुभता का नित गीत सुनाऊँ, मानव बनकर जन्म बिताऊँ। ★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"        स्वर्णिम भोर ============== सूरज आया लेकर स्वर्णिम भोर, धरती में खुशहाली है चहुँओर। कोयल गाये गीत झूमे नाचे मोर, अम्बर में खगवृन्त रोज मचाये शोर। ★★★★★★★★★★★★  डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"                       सड़क  ============= मिट्टी कंकड़ तारकोल से, सड़क जहाँ बन जाये। वही सड़क हम सब बच्चों को, स्कूल भी पहुँचाए। इसी सड़क में परिवहनों का, होता आना जाना। सड़क सभी अनमोल, नुकसान नहीं पहु...

ज्ञान सुधा भाग 2

      अनुपम भारत ================= बरस रहे है शरद सुहावन, मौसम भी है अति मनभावन। करता है मन को उजियारा, अनुपम भारत वर्ष हमारा। नदिया पर्वत जंगल घाटी, चंदन जैसे पावन माटी। व्यवहारों में नेक रहेंगे, भारतवासी एक रहेंगे। श्रद्धा से झुकती माथाएँ, सुनकर वीरों की गाथाएँ। पहन चले थे वीर सवांगा, वीर शिवाजी राणा सांगा। अंग्रेजों से कब हारे थे, वीर पुरुष जो ध्रुव तारे थे। आजादी की बनकर आँधी, चलते थे लकुटी ले गाँधी। ★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"            रेल चली भाई चली =============== हर मौसम में प्रेम भाव से, करने सबसे प्रेम चली। रेल चली भाई रेल चली, छुक छुक करती रेल चली। अपने डिब्बों के संग चलकर, नभ में धुँआ उड़ाती है। हमको लक्ष्य शिखर पहुँचाने, सीटी खूब बजाती है। नदिया पर्वत जंगल घाटी, सबसे करती खेल चली। रेल चली भाई रेल चली, छुक छुक करती रेल चली। बारिश जाड़ा या हो गर्मी, सतत चले बनकर पथ धर्मी। मुश्किल में यह प्राण बचाए, भारत भू का मान बढ़ाये। जितनी भी मुश्किल आ जाएं, हर मौसम को झेल चली। रेल चली भाई रेल चली, छुक छुक करती रेल चली। ★★★★★★★★★★ डिज...

भूपेश काका

    भूपेश काका ================ बच्चों के आँखों के तारे, हैं काका भूपेश हमारे। सुरभित कर निज परिपाटी को, जिसने महकाया माटी को। नरवा गरवा घुरवा बारी, आज बनी पहचान हमारी। सभी जगह गौठान बनाया, धरती स्वर्ग समान बनाया। स्वामी आत्मानंद विद्यालय, श्रेष्ठ बनाया हर शिक्षालय। कृषक फसल का दाम बढ़ाया, स्वास्थ्य योजना घर घर लाया। छत्तीसगढ़ी परिपाटी को, महकाया जिसने माटी को। बच्चों के आँखों के तारे, हैं काका भूपेश हमारे। ★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"