दोहा सृजन
*दोहा सृजन हेतु शब्द*
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धरती
फुलझड़ियों के रौशनी,करता दीप प्रकाश।
धनतेरस से है सुरभ,यह धरती आकाश।।
अंबर
अंबर नीला देखकर,करते जब प्रवास।
मुश्किल कितनी भी रहे,बनते वह है खास।।
नीर
बिन पानी सब जीव तो,होते हैं मजबूर।
प्यासे में जो ढूढ़ते,कोई पिला दो नीर।।
पावक
पावक बिन संसार में,नही बने कुछ काम।
अंत समय जब आये तो,जाना है सुखधाम।।
पवन
मंद पवन पुरवईया, शीतलता हर ओर।
मस्त मगन कर नाचे,मृगनयनी मन मोर।।
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डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️
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