कलम यह बोल रहा है
कलम यह बोल रहा है
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अपना भारत वर्ष सजग है,मानवता के राहों में।
धरम करम लेकर चलता है,नित ही अपने बाहों में।
इसके ओरो से छोरो तक,पावन शुभ हरियाली है।
बाग बगीचे झूम रहे हैं, आनंदित हर डाली है।
इस बगिया में जाने कैसे,घास फूंस उग आते है।
सदियों से जो दलितजनों पर,अपना हुकुम चलाते है।
कर्म इन्ही के खुशियों में,विष घोल रहा है।
मनुजता डोल रहा है, कलम यह बोल रहा है।
रंग भेद के कारण अब भी,नफरत है परिपाटी में।
धर्म बड़ा है छोटा कब है,एक धरा की माटी में।
मानव ही मानव से मिलकर,मानवता छल जाता है।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में,अब भी बंदूक चल जाता है।
आज सृजन यह सबकी आँखे, खोल रहा है।
मनुजता डोल रहा है, कलम यह बोल रहा है।
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डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"✍️✍️
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