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अषाण के दिन

       अषाण के दिन  ================== पहली नांगर बईला ल लेके, खेत कोती चल देवन  अषाण के दिन म। फेर कहाँ लुकागे ये दिन ह।। 2।। चटनी बासी  अउ गोंदली ल धरके, आवय हमर गोसानिन। तीर म बइठके गोठियाय त, कतको पीरा हो जाय उछीन। फेर बेरा के होत ल अर तता कहन, चिरई चुरगुन के चाँव चाँव। फेर कहाँ लुकागे ये दिन ह।। 2।। भुईया के भगवान ह थकगे, नांगर के जगा टेक्टर ह लगगे। कहाँ बियासी,कहाँ कोपर, ठलहा बनके सब होगे लोफर। तरिया नरवा के गरी खेलोवईया, मोर गाँव के मछरी धरोइया। फेर कहाँ लुकागे ये दिन ह।। 2।। ==================== डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

कलम उठाकर हमने जाना

  कलम उठाकर हमने जाना ================= तमस आज छाई है जग में, विपदा गहराई है जग में। नहीं सत्य का कहीं ठिकाना, कलम उठाकर हमने जाना। जिनके हाथों बागडोर है, वही देश को लूट रहे है। और उन्हीं के गुंडे हमको, समय-समय पर कूट रहे है। फिर भी हम सब उन दुष्टों का, नित गाते सम्मान तराना। नहीं सत्य का कहीं ठिकाना, कलम उठाकर हमने जाना। जो जितना बदनाम हुआ है, उसका उतना नाम हुआ है। इसीलिए तो पहन मुखौटा, हर रावण अब राम हुआ है। आज सभी मतलब के साथी, मर्यादा का गया जमाना। नहीं सत्य का कहीं ठिकाना, कलम उठाकर हमने जाना। नहीं बचे हैं आज हितैषी, जिसकी लाठी उसकी भैंसी। भ्रष्टाचारी घर-घर में है, नियमों की ऐसी की तैसी। भले रंक हो या राजा हो, काम नहीं हो बिन नजराना। नहीं सत्य का कहीं ठिकाना, कलम उठाकर हमने जाना। धन बल पद के सब लोभी, इसी बात की होड़ मची है। अब लोगों के उर अंतस में, धैर्य कामना कहाँ बची है। देने की तो बात नहीं है, सभी चाहते हैं बस पाना। नहीं सत्य का कहीं ठिकाना, कलम उठाकर हमने जाना। राग द्वेष जग ले डूबेगा, यही सभी को समझाता है। राम राज आ जाये फिर से, कोहिनूर नित ही गाता है। करम धरम के पथ में यार...

दोहा सृजन

                दोहा सृजन ★★★★★★★★★★★★★★ मानवता के भाव को,पुण्य बनाएं हेम। हिंदी माता की तरह,करती ममता प्रेम।। बिंदी कंगना पैजनी,और गले का हार। कुमकुम रोली सिंदूरी,नारी का श्रृंगार।। कालिंदी के पास में,मित्रों से कर मेल। जग के तारणहार भी,कर रहे है खेल।। ★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

अधिकार

        अधिकार पर दोहे  ======================= मन में दंभ कपट भरा,दिखने में भंगार। जता रहे फिर भी छली,बढ़ चढ़कर अधिकार।। निज-निज अधिकार का,पीट रहे जो ढोल। टिके कहाँ आडम्बरी , खुलते सबके पोल।। हम सबके अधिकार पर, देते जो नित ज्ञान। उनके ही मन मे भरा,कलुष कपट अभिमान।। इतराते अधिकार पा,भूले जो निज कर्म। वे ही भौंकें श्वान सम, बन ठनकर बेशर्म।। कोहिनूर नित चाहता,बनकर रहना हेम। दूर रहे अधिकार से,करके सबसे प्रेम।। ★★★★★★★★★★★★★★★ डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

वीर नारायण

            बलिदानी वीर नारायण सिंह ========================== चिन्हारी जे वीर पुरुष हे,भरे कटोरा धान के। वीर नारायण ले पबरित हे, भुइँया सोनाखान के। वीर नारायण के जिनगी म,अइसे दिन भी बीते हे। एक अकेला अंग्रेजी शासन से,लड़ के  जीते हे। जब अकाल के बेरा आईस,जन-जन तरसीन दाना ल। धरम करम बर ये ही धरमी,लुटे रहिस खजाना ल। घोड़ा म चढ़के जाएँ, बलिदानी सीना तान के। वीर नारायण ले पबरित हे, भुइँया सोनाखान के। बज्र बरोबर तन के बलिदानी,जब भुइँया नापे। सेट महाजन अउ अँग्रेजी,शासन थर-थर काँपे। जेहर आघु म आ जाये,अपन प्राण गवाएं। मेंछा म दे ताव वीर जब,जब तलवार चलाये। आज वहीं बलिदानी दे,आदर्श हमर अभिमान के। वीर नारायण ले पबरित हे, भुइँया सोनाखान के। ★★★★★★★★★★★★★★★★★         डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️

बलिदानी वीर नारायण

             महिमा वीर नारायण के =============================== महिमा वीर नारायण के ये,जे भुइँया म भारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। जन-जन के हितवा बनके,जे बेटा बिताईन जी। धन के लोभी छलिया मन ल,निसदिन यही सताइन जी। माल खजाना लूट लूट के, निर्धन मन ल दान करे। भांज अपन तलवार ल मेंछा,म साहस के ताव भरे। ममता दया करे जेकर  बर, छत्तीसगढ़ महतारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। नाम अमर हे बलिदानी के,छत्तीसगढ़ परिपाटी म। आज भी जेहर हवय बिराजे,ये भुइँया के माटी म। सोनाखान धरा के धुर्रा,पबरित जइसे चंदन हे। बलिदानी के ये महिमा ल,कोहिनूर के वंदन हे। कल बलिदानी लड़ीस न्याय बर,अब हे हमरो पारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। वीर नारायण लड़ीस न्याय बर,अब हे हमरो पारी जी। सोनाखान हवय हमरो ,बलिदानी के चिन्हारी जी। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★★             डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"✍️✍️

मुक्तक - प्यार

 मंच मुक्तक - प्यार ============== तू जितना रूठ ले मुझसे,तुझे इक दिन मना लूँगा। तेरी गैरत को भी हमदम,मैं अपना दिल बना लूँगा। तू गर आवाज दे मुझको,जहाँ को छोड़ कर आऊँ। बसाकर मन की मंदिर में,तुझे मंजिल बना लूँगा। जिसे मैं रोज पूजूँगा,प्रिये तुम ही ओ मूरत हो। तुम्हारे नाम से धड़के,मेरे दिल की जरूरत हो। तुम्हारे बिन न रो पाऊँ,नहीं मैं हँस कभी सकता। वहीं एहसास जीवन की,तुम्हीं तो खूबसूरत हो। जिसे दिल ने सदा चाहा,जिसे पाने को ठाना हूँ। इबादत रोज करने को,खुदा जिसको मैं माना हूँ। पलटकर देख ले मुझको,भी तू एकबार ये जानम। तेरा ही हमनशी हूँ मैं,तेरा ही मैं दीवाना हूँ। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★  डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"✍️✍️✍️