वीर रस - श्री राम
भारत में श्री राम हुए
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जिनसे भारत का नाम अमर,
जिनसे सुर भी रजधानी है।
जिनसे विपदाएँ टलते है,
रवि चंद्र उगे और ढ़लते है।
जिसे नाम से धर्म संवरते है,
जिनसे बाधाएँ डरते है।
जिनकी सत्ता भू व्योम तलब तक,
कण कण छण छण सुखधाम हुए।
वह ही मर्यादा के साधक,
इस भारत में श्री राम हुए।
जब पाप बढ़ा इस धरती पर,
तब धर्म ध्वजा धारण कर ली।
शक्तिशाली रावण का भी,
घर में घुस संघारण कर ली।
जिनके ध्वज फहराते है सब,
निज घर के शीर्ष मुंडेरों में।
वह राम मिलेंगे शबरी के,
जूठे मीठे हर बेरो में।
युग युग से तारण मोक्ष मिला,
जिनके शुभ पुण्य कहानी में।
जिसमें लिख जाता राम नाम,
पाहन भी तैरे पानी में।
वाल्मीकि तुलसी के हृद के,
थे जो ललित ललाम हुए।
वह ही मर्यादा के साधक,
इस भारत में श्री राम हुए।
जब राज तिलक के बदले में,
रघुनंदन को वनवास मिला।
जो सबके प्राण हरण करते,
उस पालक को भी त्रास मिला।
वानर को जिसने मित्र चुना,
उनको हनुमत सा दास मिला।
जिनसे त्रेता में जन्म लिया,
साधु संतों के ढाल बने।
उद्धार अहिल्या का कर के,
उद्धारक परम कृपाल बने।
सुनते है सारी पीर व्यथा,
जब जग में त्राहिमाम हुए।
वह ही मर्यादा के साधक,
इस भारत में श्री राम हुए।
★★★★★★★★★★
डिजेन्द्र कुर्रे"कोहिनूर"
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