ज्ञान सुधा 2

           भाग - 2

ज्ञान सुधा (बाल पत्रिका)

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ज्ञान सुधा का अमृत पी लो,

विद्यार्थी का जीवन जी लो।

ज्ञान बिना जीवन दुखदाई,

बात समझ लो बहना भाई।


कदम से कदम मिला चलना है,

कुंदन के जैसे जलना है।

लहराए यह पुण्य तिरंगा,

बहे ज्ञान की पावन गंगा।


राम कृष्ण मुनियों की धरती,

सबका  पालन पोषण करती।

अन्न धन की भंडार यही है,

ममता प्यार दुलार यही है।


धरती अम्बर तक जो फैला,

खुशियों को मत करना मैला।

शुभता का नित गीत सुनाऊँ,

मानव बनकर जन्म बिताऊँ।

★★★★★★★★★★

डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"


       स्वर्णिम भोर

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सूरज आया लेकर स्वर्णिम भोर,

धरती में खुशहाली है चहुँओर।

कोयल गाये गीत झूमे नाचे मोर,

अम्बर में खगवृन्त रोज मचाये शोर।

★★★★★★★★★★★★

 डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"

 

          

         सड़क

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मिट्टी कंकड़ तारकोल से,

सड़क जहाँ बन जाये।

वही सड़क हम सब बच्चों को,

स्कूल भी पहुँचाए।


इसी सड़क में परिवहनों का,

होता आना जाना।

सड़क सभी अनमोल,

नुकसान नहीं पहुँचाना।

★★★★★★★★★★

डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"




         गौरैय्या

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फुदक फुदक कर घर आँगन में,

सुंदर नाच नच्चियाँ।

कहाँ गुम है जाने जग से,

वह प्यारी गौरय्या।


चींव-चींव कर-कर के खिड़की से,

थी जो हमें जगाती।

हम बच्चों पर सुबह सुबह जो,

अपना प्यार जताती।


कैसे आ पाए वह बेला,

किसमें हो गौरय्या।

इस धरती को स्वर्ग बनाये,

आओ बहना भैय्या।


अपनी बूढ़ी हाथ फेर कर,

हमें प्रेम सिखलाती।

इसी कथा हमको दादी,

हमको रोज सुनाती।

★★★★★★★★★★

डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"



तोता मैना की कहानी

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एक शहर से मैना आई,

एक शहर से तोता।

तोता बोल रहा मैना से,

अपनी नैन भिगोता।


सुन मैना किस तरह बनेगी,

अपनी प्रेम कहानी।

यह दुनिया वाले करते है,

नित अपनी मनमानी।


पेड़ सभी कट चुके जगत में,

जीवन कहाँ  बिताए।

बहुत शोर है इस दुनिया में,

गाना कहाँ से गाए।


लोभी दुनिया में हम कैसे,

पाए दाना पानी।

यह दुनिया वाले करते है,

नित अपनी मनमानी।


फल उसको वैसा मिलता है,

जो जैसा है बोता।

तोता बोल रहा मैना से,

अपनी नैन भिगोता।

★★★★★★★★★

डिजेन्द्र कुर्रे"कोहिनूर"



           जूता

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इन जूतों बिन कौन सका है,

अपना मंजिल पाना।

इन्हें पहनकर ही पाए है,

कितने लोग खजाना।


तेज धूप में सड़क तवे पर,

जूता पाँव बचाता है।

खुद घिस घिस कर हमें सुरक्षित,

मंजिल हमें पहुँचाता है।


सभी धूल कीचड़ से पग को,

सदा सुरक्षा देता है।

फिर भी नित्य नकारा जाता,

जैसे कोई नेता है।


सीमा पर जो वीर खड़े है,

वह भी इसे पहनते है।

इसे पहनकर उन वीरों की,

चौड़े सीना तनते है।


इनसे ही तो मान बढ़ा है,

अपने वीर सपूतों की।

सबका मान बढ़ाया जिसने,

मान नहीं उन जूतों की।

★★★★★★★★★★★

 डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"




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