दोहा सृजन
दोहा सृजन
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मानवता के भाव को,पुण्य बनाएं हेम।
हिंदी माता की तरह,करती ममता प्रेम।।
बिंदी कंगना पैजनी,और गले का हार।
कुमकुम रोली सिंदूरी,नारी का श्रृंगार।।
कालिंदी के पास में,मित्रों से कर मेल।
जग के तारणहार भी,कर रहे है खेल।।
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डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️
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