अधिकार

        अधिकार पर दोहे 

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मन में दंभ कपट भरा,दिखने में भंगार।

जता रहे फिर भी छली,बढ़ चढ़कर अधिकार।।


निज-निज अधिकार का,पीट रहे जो ढोल।

टिके कहाँ आडम्बरी , खुलते सबके पोल।।


हम सबके अधिकार पर, देते जो नित ज्ञान।

उनके ही मन मे भरा,कलुष कपट अभिमान।।


इतराते अधिकार पा,भूले जो निज कर्म।

वे ही भौंकें श्वान सम, बन ठनकर बेशर्म।।


कोहिनूर नित चाहता,बनकर रहना हेम।

दूर रहे अधिकार से,करके सबसे प्रेम।।

★★★★★★★★★★★★★★★

डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर" ✍️✍️




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