मुक्तक - विदाई

 मुक्तक - विदाई 

★★★★★★★★★

कर्म क्षेत्र में जो सुख-दुख है,

मिलजुल कर वह सहन करो। 

लाभ जगत को हो शिक्षा से, 

मन मंथन तुम गहन करो ।

जग के जंजालों में पड़कर ,

आलसवान नहीं बनना ।

जो दायित्व मिला कंधों को ,

उसका नित निर्वहन करो ।

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शिक्षा के पावन मंदिर का ,

सौंप रहा हूँ भार तुम्हें ।

विनती करता हूँ प्रभुवर से ,

नहीं मिले कभी हार तुम्हें ।

मेरे नौकरी कार्यकाल में ,

जिन लोगों ने साथ दिया ।

अपने मन की गहराई से ,

करता हूँ आभार तुम्हें ।

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रचनाकार - डिजेन्द्र कुर्रे

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