मुक्तक - विदाई
मुक्तक - विदाई
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कर्म क्षेत्र में जो सुख-दुख है,
मिलजुल कर वह सहन करो।
लाभ जगत को हो शिक्षा से,
मन मंथन तुम गहन करो ।
जग के जंजालों में पड़कर ,
आलसवान नहीं बनना ।
जो दायित्व मिला कंधों को ,
उसका नित निर्वहन करो ।
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शिक्षा के पावन मंदिर का ,
सौंप रहा हूँ भार तुम्हें ।
विनती करता हूँ प्रभुवर से ,
नहीं मिले कभी हार तुम्हें ।
मेरे नौकरी कार्यकाल में ,
जिन लोगों ने साथ दिया ।
अपने मन की गहराई से ,
करता हूँ आभार तुम्हें ।
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रचनाकार - डिजेन्द्र कुर्रे
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