गीत माखन चोर

 

    माखन चोर
★★★★★★★
जिसकी मधुर मुरलिया सुनके,
गोकुल में नित भोर हुआ।
लीलाएँ  करने को कान्हा,
ब्रज का माखन चोर हुआ।
★★★★★★★★★★★
बाल सखाओ के संग कान्हा,
अनुपम रिश्ता जोड़ा है।
बना पिरामिड मित्रों संग,
माखन की मटका तोड़ा है।
चोरी जब पकड़ी जाती तब,
सजा सुनाई जाती थी।
मातु यशोदा कान्हा को फिर,
उँखल से बंधवाती थी।
कान्हा के तन पर जो लिपटा,
धन्य सदा वह डोर हुआ।
लीलाएँ  करने को कान्हा,
ब्रज का माखन चोर हुआ।
★★★★★★★★★★★
भूल नही सकते जग वाले,
कान्हा के अवदानों को।
सरल सहज जिसनें तोड़ा,
सब दंभी के अभिमानों को।
ब्रज वालों के तन मन में जब,
बल बुद्धि संचारण की।
और सभी के रक्षक बनकर,
गोवर्धन को धारण की।
जब वासव के क्रोध अगन से,
ब्रज में दुख घनघोर हुआ।
लीलाएँ  करने को कान्हा,
ब्रज का माखन चोर हुआ।
★★★★★★★★★★★
रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822 

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