बेटी पर दोहे

         

             बेटी पर दोहे

★★★★★★★★★★★★★

बेटी बुलबुल बाग की , बेटी माँ का रूप।

बेटी ही सुरभित करे,दो कुल अतुल अनूप।।


मात-पिता की लाडली,बेटी घर की शान।

बेटी भी घर में बने,क्योंकर नहीं महान।।


बेटी ही कविता सरस,और मधुर सुर-ताल।

बेटी से सुरभित सदा,घर बगिया की डाल।।


बेटी माँ की है परी,बाबुल का अभिमान।

बेटी से ही हो परम,सदन में शुभ बिहान।।


कोहिनूर सुरभित रहे ,बेटी का मन बाग।

इनके खुशियों में कभी,नहीं लगाना आग।।


बेटी होती है सदा , अपने घर की मान ।

जिसके पावन कर्म पर,होता है अभिमान।।


घर में खुशियाँ दे सदा,बेटी हैअभिमान।

ऐसी बेटी का हमें ,करना निज सम्मान।।


बेटी के मन में जगे,धरम करम का आस।

बेटी को रखना सदा ,अंतर मन के पास।।


किनको प्यारा है नही,तुतले मीठे बोल।

बेटी के हर शब्द में,प्रेम भरे अनमोल।।


जिज्ञासा के प्रेम में , मिलता है आनंद।

कोहिनूर जिसके लिए,लिखताअनुपम छंद।।

★★★★★★★★★★★★★★★

रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे कोहिनूर


Comments

Popular posts from this blog

घनाक्षरी - तिरंगे की शान

भाईचारा पर दोहे

मुक्तक - विदाई