गीत - सावन
ताटंक छंद - सावन
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तन मन भीग रहा है मेरा,
रिमझिम सरस फुहारों में।
कोयल कूक रही है मधुरिम,
नाचे मोर बहारों में ।
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घुमड़ घुमड़ कर बादल गरजे,
घटा टोप अंधियारी है ।
आसमान में बिजली चमके,
तन मन में डर भारी है ।
भरे लबालब ताल तलैया,
झरने सभी बहकते हैं ।
तरु लता आलिंगन करके,
होकर मगन लहकते हैं ।
हर प्राणी में सिहरन भर दे ,
ऐसी कशिश बयारों में ।
कोयल कूक रही है मधुरिम,
नाचे मोर बहारों में ।
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मन को मन से लूट रही है,
आभा इस हरियाली की ।
पावस में लक्षण दिखता है,
हर घर में खुशहाली का ।
शिव भक्ति में डूब गया है ,
भक्तों की सारी टोली ।
बम बम भोले बम बम भोले,
सब ही बोल रहे बोली ।
इस सावन में भीड़ लगी है ,
शिव मंदिर की द्वारों में ।
कोयल कूक रही है मधुरिम,
नाचे मोर बहारों में।
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रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822
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