गीत झूठे भी मिल जाते
गीत - झूठे भी मिल जाते हैं
★★★★★★★★★★★
जिनके आडम्बर से नित ही,
तन मन भी हिल जाते हैं।
सत्यवादियों की बस्ती में,
झूठे भी मिल जाते हैं।
★★★★★★★★★★
कभी किसी को मिले तरक्की,
मन ही मन यह जलते हैं।
छूट कपट के हथियारों से,
तब उस जन को छलते हैं।
भले योग्य ये नहीं रहे पर,
पद पर दावा करते हैं।
दूजों को लड़वा संतन बन,
नित्य छलावा करते हैं।
बदले का मन भाव लिए,
हद से नीचे गिर जाते हैं।
सत्यवादियों की बस्ती में,
झूठे भी मिल जाते हैं।
★★★★★★★★★★
जो श्वानों के दुम के सम हैं,
वह कब सीधे होते है।
द्वेष कपट को नहीं त्यागते,
भले स्वयं ही रोते हैं।
ऐसे लोगों का कलुषित मन,
कलुष सदा ही गढ़ता है।
ज्यों काले कंबल में कोई,
रंग कहाँ कब चढ़ता है।
अपनों को भी नहीं छोड़ते,
दुष्ट सदा छल जाते हैं।
सत्यवादियों की बस्ती में,
झूठे भी मिल जाते हैं।
★★★★★★★★★★★
रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822
Comments
Post a Comment