मुक्तक - तिरंगा

 

         मुक्तक - तिरंगा
★★★★★★★★★★★★
हिमशिखरों से बहकर निकली,
पतित पावनी गंगा हैं।
नील गगन में करलव करते,
दल में उड़े विहंगा हैं।
जो भारत की परिपाटी को,
धारण करके उड़ता हैं।
सबके दिलों में ओज जगाता,
अपना पुण्य तिरंगा हैं।
★★★★★★★★★★★
रघुवर रहबर की धरती में,
पावन प्रेम बहाता हैं।
देख जिसे उत्साह हृदय में,
हम सबके भर जाता है।
जयकारों के शुभ गुंजन से,
मन रोमांचित होता हैं।
पुण्य तिरंगा जब जब नभ में,
लहर लहर लहराता है।
★★★★★★★★★★★
जिसमे गंध समाहित नित हैं,
केशर वाली घाटी की।
गाथाएँ जिसमे मिलती है,
पुज्य सभी परिपाटी की।
जिस पर गर्व सदा होता है,
हम सब भारतवासी को।
पुण्य तिरंगा शान है अपनी,
इस भारत की माटी की।
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रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822 


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