कोहिनूर के दोहे
कोहिनूर की दोहे
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आँख मिचौली खेल में , दक्ष हुई बरसात।
कहीं विकट जलधार है,कहीं उष्ण आघात।।
मन वीणा के तार में , कहाँ बची झनकार।
भटक गए निज राह से,अब सब रचनाकार।।
मतलब मन में साधकर , आते हैं आगत्य।
शायद अब मृत प्राय है,इस दुनिया में सत्य।।
बागडोर जिनको दिया,समझ परम करतार।
निज भारत के शील को,करते तारम तार।।
कोहिनूर जग में मिले,जन जन के मन खोट।
निज मन नित्य सँवारना,मत करना मन छोट।।
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रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822
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