गीत - रक्षाबंधन
गीत - रक्षाबंधन
★★★★★★★★★★★
सावन के इस पुण्य पर्व ने,
मन में प्रीत जगाई है।
अक्षत कुमकुम दीप सुमन से,
थाली आज सजाई है।
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टूट नहीं पाता वह बल है,
इस रेशम के बंधन में।
भाल सजा देती है बहना,
रोली कुमकुम चंदन में।
बहना को भाई से अतुलित,
इस राखी में प्यार मिले।
बचपन की यादें है जिसमें,
पावन वह संसार मिले।
जब वापस जाती हैं बहना,
नैना तब भर आई हैं।
अक्षत कुमकुम दीप सुमन से,
थाली आज सजाई है।
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अगर बहन आ नही सके तो,
भाई को दुख होता हैं।
आँसू नहीं बहाता पर वह,
मन ही मन में रोता है।
बहना भी अपने भैया बिन,
सुखी कहाँ रह पाती हैं।
भैया के बारे में सोचकर,
बहुत व्यथीत हो जाती हैं।
यह दोनों में इक दूजे की,
जीवन की परछाई है।
अक्षत कुमकुम दीप सुमन से,
थाली आज सजाई है।
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रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822
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