योग

 

मनहरण घनाक्षरी - योग
★★★★★★★★★★
मनन चिंतन  कर,
ईष्ट देव  याद कर।
योग ध्यान करके ही,
अध्यात्म जगाना है ।
★★★★★★★★
एक-एक मिलकर ,
नित आगे बढ़कर ।
हरियाली धरा हेतु ,
वृक्ष को लगाना है।
★★★★★★★
चहुँ ओर योग रहें,
न किसी को रोग रहें।
सब ही निरोगी रहें,
सेहत बनाना है।
★★★★★★★
रोज रोज योग करें,
न अधिक भोग करें।
जीवन हो सुखधाम,
योग अपनाना है।
★★★★★★★
डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822

Comments

Popular posts from this blog

घनाक्षरी - तिरंगे की शान

भाईचारा पर दोहे

मुक्तक - विदाई