पिता पर दोहे

                  पिता पर दोहे

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पिता सदा परिवार का , होता पालनहार।

पुज्य पिता से है सुरभ,अपना घर परिवार।।


पुज्य पिता संसार में,है भगवन का रूप।

इसके पावन प्रेम से,खुशियाँ मिले अनूप।।


मन में रखता है सदा,पिता परम निज प्यार।

निज बच्चों का है यही,खुशियों का संसार।।


धर्म निभाता है पिता,रहकर घर में शांत।

जैसे हो संसार का ,सागर परम प्रशांत।।


कर्म सभी करने पिता,नहीं डिगाता पाँव।

बच्चों को देता सदा,प्रेम समाहित छाँव।।

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रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"



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