गलवान घाटी
मुक्तक - गलवान घाटी(चीन की गुस्ताखी)
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अरे चीनी अरे पाकी,
हमें तुम क्यों उकसाते हो।
सिंह सोये हुए है जो,
उन्हें क्योंकर जगाते हो।
स्वान की मौत मरते हो,
हिन्द की सीमा में आकर।
समझ आता नही तुमको,
सदा ही हार जाते हो।
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तेरे बंदूक में है जितना,
जोर अपने भी लाठी में।
बनाता शेर बेटों को,
ऊर्वर हिन्द माटी में।
अगर चाहें तुझे रे चाइना,
पल में मसल देंगे।
चटाई धूल वीरों ने,
तुझे गलवान घाटी में।
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रचनाकार-डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना,बलौदाबाजार(छ.ग.)
मो. 8120587822
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